गाजर घास में फूल आने से पहले जड़ को उखाड़ फेंकने के दिए गए टिप्स
हिंदुस्तान न्यूज़ एक्सप्रेस कानपुर | सीएसए के परिसर में गाजर घास उन्मूलन जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। कुलपति डॉक्टर संजीव गुप्ता ने कहा कि गाजर घास (पार्थेनियम) देश के विभिन्न भागों में सफेद टोपी, चटक चांदनी, गंधी बुटी आदि के नामो से जाना जाता है। डॉ गुप्ता ने कहा कि यह खरपतवार रेलवे लाइन, सड़क के किनारे तथा खेतों में भी फैला हुआ है। उन्होंने कहा कि वर्षा ऋतु में इसका अंकुरण होने पर भीषण खरपतरवार का रूप ले लेती है। कहा कि यह घास तीन-चार महीने में अपना जीवन चक्र पूरा कर लेती है। उन्होंने बताया कि इस घास से मनुष्यों में त्वचा संबंधी एलर्जी, दमा, बुखार आदि पैदा होता है। पशुओं के लिए भी यह खरपतवार हानिकारक है। इसके रोकथाम के लिए गाजर घास में फूल आने से पहले जड़ को उखाड़ देना चाहिए। जड़ से उखाड़ने से गाजर घास के फैलाव को रोका जा सकता है। उन्होंने इसके उन्मूलन को लेकर विविध जानकारी दी। गाजर घास जागरूकता कार्यक्रम सभी छात्रावासों के परिसर में कराया गया। इस मौके पर सभी वार्डेंस, सहायक वार्डेंस एवं छात्र छात्राएं उपस्थित रहे।
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